Sunday, June 19, 2016

खुशियाँ और ग़म सहती है फिर भी ये चुप रहती है

खुशियाँ और ग़म सहती है फिर भी ये चुप रहती है
अब तक किसी ने न जाना, ज़िंदगी क्या कहती है

अपनी कभी तो कभी अजनबी
आँसु कभी तो कभी है हँसी
दरिया कभी तो कभी तिश्नगी
लगति है ये तो
खुशियाँ और ग़म सहती है   ...

खामोशियों की धीमी सदा है
ये ज़िंदगी तो, रब की दुआ है
छू के किसी ने इसको, देखा कभी न
अहसास की है खुशबू, महकी हवा है
खुशियाँ और ग़म सहती है   ...

मन से कहो तुम, मन की सुनो तुम
मन मीत कोई, मन का चुनो तुम
कुछ भी कहेगी दुनिया
दुनिया को छोड़ो
पलकों में सजाके झिलमिल सपने बुनो तुम
खुशियाँ और ग़म सहती है   ...


No comments:

Post a Comment